धैर्य के साथ रखें दूर की सोच


आलोक पुराणिक
चुनाव निपट लिये हैं। मंत्रियों की शपथ हो गयी है। यानी अर्थव्यवस्था को लेकर एक न्यूनतम आश्वस्ति का माहौल तो होना चाहिए। मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक सेंसेक्स बहुत तेजी से ऊपर गया और फिर गिरावट दिखायी। कुल मिलाकर देखें तो सेंसेक्स ने पांच सालों के हिसाब से करीब 12 प्रतिशत सालाना का प्रतिफल दिया है। इस प्रतिफल को बेहतरीन माना जा सकता है। पर सवाल यह है कि बाजार फिर तेजी से ऊपर-नीचे क्यों जाता है, और उसके ऊपर-नीचे जाने का क्या असर शेयर बाजार, निवेश, म्यूचुअल फंड, सेंसेक्स पर पड़ता है।
बाजार में भाव लगातार ऊपर जायेंगे और नीचे भी जायेंगे। बाजार तो तमाम खबरों से प्रभावित होता है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि तमाम निवेशकों को भी अपने निर्णय बाजार की रोज की उठापटक से बदलने चाहिए। म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए जितनी जरूरत ज्ञान की होती है, उससे कहीं ज्यादा धैर्य की होती है। कुछ लोगों के पास यह होता है, कुछ के पास नहीं होता। कुछ लोग बहुत जल्दी पैनिक में आ जाते हैं। ऐसे लोगों को सेंसेक्स के हजार बिंदु गिरने से बेहोशी आ सकती है। स्टाक बाजार में निवेश, म्यूचुअल फंड में निवेश ऐसे लोगों के लिए नहीं है। सलाहकार यही सलाह देते हैं कि म्यूचुअल फंड में निवेश करने के बाद कम से कम पांच सालों तक तो अपने निवेश की ओर न देखें।
अर्थव्यवस्था है, अच्छा-बुरा तो होता ही रहेगा। हाल में सेंसेक्स 4०० बिंदुओं का आंकड़ा पार कर गया, फिर गिरावट दर्ज की गयी। अर्थव्यवस्था सच में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों से दो-चार है।
वित्त मंत्रालय के एक नोट में इस बात को स्वीकार किया गया है कि अर्थव्यवस्था सुस्त हो रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद में विकास करीब सात प्रतिशत ही रहने की उम्मीद है। कुछ जानकार मानते हैं कि 2018-19 में विकास दर सात प्रतिशत से भी और नीचे गिरकर 6.5 प्रतिशत होने की आशंका है। 2017-18 में विकास दर का यह आंकड़ा 7.2 प्रतिशत का था। इससे पहले के साल यानी 2016-17 में यह आंकड़ा 8.2 प्रतिशत का था। अर्थव्यवस्था सुस्त हो रही है, ऐसे आंकड़े तमाम बाइक कंपनियां, तमाम कार कंपनियां दे रही हैं। यह अलग बात है कि सात प्रतिशत की विकास दर भी कम नहीं है, भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार को देखकर।
पर इस दर पर चिंताएं इसीलिए हैं कि सुस्त अर्थव्यवस्था में से संसाधनों की उगाही मुश्किल होगी। संसाधन जरूरी हैं क्योंकि तमाम किस्म के वादे किये हैं। उधर मानसून आने में देरी हो गयी है। एक अनुमान के मुताबिक मानसून कमजोर रहेगा। एक महत्वपूर्ण सवाल जीएसटी यानी माल और सेवा कर के संग्रह को लेकर है। सुस्त अर्थव्यवस्था का असर सुस्त कर संग्रह पर भी दिख रहा है। 2018-19 में जीएसटी संग्रह करीब 11 लाख 77 हजार करोड़ रुपये का हुआ, जो लक्ष्य से करीब 75000 करोड़ रुपये कम थे।
ग्लोबल व्यापार युद्ध की आशंकाएं सामने हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन पर जो आरोप लगाते हैं, उनका आशय है कि चीन एक तरह से अमेरिका को ठग रहा है, चीन अपना माल अमेरिका में खूब बेचता है और बदले में उतना माल अमेरिका का चीन में नहीं आने देता। आंकड़ों के मुताबिक 2018 में चीन ने अमेरिका में करीब 539 अरब डालर का माल निर्यात किया पर सिर्फ 120 अऱब डॉलर का माल अमेरिका से आयात किया। यानी अमेरिका ने करीब 419 अरब डॉलर का व्यापार घाटा उठाया।
यूं यह रकम कितनी बड़ी है, इस बात का अंदाजा इससे लग सकता है कि भारत का साज-सामान का निर्यात पूरे 2018-19 में करीब 330 अरब डालर का था, यानी भारत के साज-सामान निर्यात की समूची रकम से भी ज्यादा अमेरिका का व्यापार घाटा चीन के साथ ज्यादा है। यूं भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा चीन के मुकाबले बहुत कम है-करीब 21 अरब डॉलर यानी चीन के व्यापार घाटे का करीब पांच प्रतिशत। फिर भी ट्रंप भारत को टैरिफ किंग कहकर अपमान मिश्रित मजाक से नवाजते हैं।
दूर की सोच रखने वाले निवेशक जानते हैं कि इन सारे बवालों और सवालों के पार अर्थव्यवस्था जायेगी और पांच-सात सालों बाद जब हम सेंसेक्स के रिटर्न देखेंगे तो लघु अवधि के घटनाक्रमों का असर सेंसेक्स पर न्यूनतम दिखेगा। म्यूचुअल फंड निवेश में बाजार जोखिम रहते हैं। इसलिए निवेशक अपना अध्ययन करें या किसी वित्तीय सलाहकार की सलाह लें।
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