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	<title>मध्यप्रदेश Archives | Soochana Sansar</title>
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	<title>मध्यप्रदेश Archives | Soochana Sansar</title>
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		<title>कुछ ऐसा हो, ताकि पन्ना में जीवित रहे वत्सला की स्मृतियां&#8230;.</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jul 2025 05:42:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>@पन्ना से अरुण सिंह / आशीष सागर डेस्क टीम पन्ना। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड-बघेलखण्ड वाले मिलेजुले पर्यावास मे स्थित पन्ना टाइगर राष्ट्रीय वन्यजीव अभ्यारण की शान और बुजुर्ग दादी &#8216;वत्सला&#8217; अब हमारी स्मृति मे बसेगी। ऐसा दावा मध्यप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव जी ने किया है। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने भी अपनी &#8230;</p>
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<p><img fetchpriority="high" decoding="async" width="401" height="301" class="wp-image-15772" style="width: 401px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160755657.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160755657.jpg 2048w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160755657-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160755657-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160755657-768x576.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160755657-1536x1152.jpg 1536w" sizes="(max-width: 401px) 100vw, 401px" /></p>



<p>@<strong>पन्ना से अरुण सिंह / आशीष सागर डेस्क टीम </strong></p>



<p>पन्ना। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड-बघेलखण्ड वाले मिलेजुले पर्यावास मे स्थित पन्ना टाइगर राष्ट्रीय वन्यजीव अभ्यारण की शान और बुजुर्ग दादी &#8216;वत्सला&#8217; अब हमारी स्मृति मे बसेगी। ऐसा दावा मध्यप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव जी ने किया है। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने भी अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल मे वत्सला से जुड़े चित्र साझा करते हुए उन्हें आत्मीय श्रद्धांजलि दी है।</p>



<p><img decoding="async" width="400" height="300" class="wp-image-15773" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160771068.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160771068.jpg 2048w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160771068-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160771068-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160771068-768x576.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160771068-1536x1152.jpg 1536w" sizes="(max-width: 400px) 100vw, 400px" /></p>



<p> जब तमाम वन्यजीवों की बुजुर्ग दादी और दुनिया की सबसे बूढ़ी हथिनी हमारे बीच अब नही है। ऐसे मे वन्यजीव प्रेमियों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह वत्सला के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व का पर्यावरण एवं परिवेश सुरक्षित रखें। यह अलग बात है कि केन-बेतवा नदी गठजोड़ से इस विशाल जंगल के फेफड़ों पर व्यापक असर पड़ेगा।</p>



<p><img decoding="async" width="1400" height="1050" class="wp-image-15775" style="width: 1400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160752354.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160752354.jpg 2048w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160752354-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160752354-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160752354-768x576.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160752354-1536x1152.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1400px) 100vw, 1400px" /></p>



<p>&#8220;<strong>वत्सला&#8221;</strong> की स्मृति व उसके मानवीय गुणों की सुगंध पन्ना की माटी में हमेशा महसूस हो, इसके लिए पन्ना टाइगर रिज़र्व की धरोहर रही इस हथिनी के नाम पर कुछ ऐसा हो जो वत्सला की स्मृतियों को हमेशा जीवित रखे। यह भाव पन्ना वासियों का ही नहीं अपितु देश व दुनिया भर के वन्य जीव प्रेमियों का भी है।</p>



<p>गौरतलब है कि दुनिया की सबसे उम्र दराज हथिनी वत्सला की जर्जर हो चुकी देह ने भले ही साथ छोड़ दिया है, लेकिन उसका प्रेम, वात्सल्य, आत्मीयता व सहनशीलता जैसे मानवीय गुण उसकी स्मृतियां को अमिट रखेंगे। वत्सला महज एक हथिनी नहीं थी बल्कि वह अपने नाम के अनुरूप प्रेम, स्नेह और ममता की प्रतिमूर्ति भी थी। पन्ना ही नहीं अपितु देश, प्रदेश व दुनिया भर के वन्य जीव और प्रकृति प्रेमियों ने जिस तरह से वत्सला की मौत पर अपनी भावनाओं का इजहार किया है, वह अभूतपूर्व है।</p>



<p><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="300" class="wp-image-15776" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160745655.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160745655.jpg 2048w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160745655-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160745655-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160745655-768x576.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160745655-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></p>



<p>प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव सहित केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान व भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद बीडी शर्मा ने वत्सला की पावन स्मृतियों को याद करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है। मीडिया में राष्ट्रीय स्तर पर पन्ना की इस धरोहर के जीवन पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। यह इस बात का द्योतक है कि वत्सला से दुनिया भर के लोगों का किस तरह से जुड़ाव व आत्मीय रिश्ता रहा है।</p>



<p><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="300" class="wp-image-15777" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160749154.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160749154.jpg 2048w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160749154-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160749154-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160749154-768x576.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1752160749154-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></p>



<p>पन्ना की शान रही &#8220;वत्सला&#8221; के जीते जी उसका नाम दुनिया की सबसे उम्र दराज हथिनी के तौर पर वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो सका। निश्चित रूप से जिसकी वह हकदार थी, वह जीते जी उसे नहीं मिल पाया। इस बात का अफसोस पन्ना वासियों को हमेशा रहेगा। इसकी भरपाई करने के लिए क्या यह जरूरी नहीं है कि पन्ना में वत्सला के नाम से कुछ ऐसा हो ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनूठी हथिनी के जीवन से परिचित हो सकें।</p>



<p><img loading="lazy" decoding="async" width="401" height="301" class="wp-image-15756" style="width: 401px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1751996065502.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1751996065502.jpg 640w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1751996065502-300x225.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 401px) 100vw, 401px" /></p>



<p>शायद ऐसा करना &#8220;वत्सला&#8221; को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। क्या करना चाहिए यह पन्ना के नागरिक, जनप्रतिनिधि, पत्रकार व पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारी तय करें। इसके लिए सभी से सुझाव भी लिए जा सकते हैं और बेहतर सुझावों को मूर्त रूप दिया जा सकता है। वत्सला के पावन स्मृतियों की खुशबू पन्ना की माटी में सदा जीवंत रहे, ऐसी कामना है। <strong>दैनिक सूचना संसार की तरफ से वत्सला को अश्रुपूरित पुष्पाजंलि अर्पित। </strong></p>
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		<item>
		<title>पन्ना ज़िले मे रैपुरा तहसीलदार को सागर लोकायुक्त पुलिस ने किया गिरफ्तार….</title>
		<link>https://soochanasansar.in/sagar-lokayukta-police-arrested-raipura-tehsildar-in-panna-district/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Jun 2025 08:02:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पन्ना के रैपुरा तहसीलदार चन्द्रमणि सोनी 3 हजार रु. की रिश्वत लेते गिरफ्तार। पन्ना,9 जून 25। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले मे रैपुरा तहसीलदार चन्द्रमणि सोनी को लोकायुक्त पुलिस ने आज 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। आरोपी तहसीलदार रैपुरा स्थित अपने शासकीय आवास में शिकायत कर्ता कल्याण सिंह लोधी से जब &#8230;</p>
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<ul class="wp-block-list">
<li>पन्ना के रैपुरा तहसीलदार चन्द्रमणि सोनी 3 हजार रु. की रिश्वत लेते गिरफ्तार।</li>
</ul>



<p><br><strong>पन्ना,9 जून 25।</strong> मध्यप्रदेश के पन्ना जिले मे रैपुरा तहसीलदार चन्द्रमणि सोनी को लोकायुक्त पुलिस ने आज 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। आरोपी तहसीलदार रैपुरा स्थित अपने शासकीय आवास में शिकायत कर्ता कल्याण सिंह लोधी से जब रिश्वत की रकम ले रहा था, उसी समय लोकायुक्त सागर पुलिस ने रंगे हाथ गिरफ्तार किया है।</p>



<p><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="335" class="wp-image-15673" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1749455327710.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1749455327710.jpg 780w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1749455327710-300x252.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1749455327710-768x644.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></p>



<p><br>लोकायुक्त निरीक्षक श्री मति रोशनी जैन ने बताया कि शिकायत कर्ता की पत्नी द्रोपदी बाई की ग्राम पिपरिया कला तहसील रैपुरा में पैतृक जमीन है। इस जमीन पर उसके रिश्तेदारों ने कब्जा कर रखा है। जमीन को कब्जे से मुक्त कराने के लिए तहसीलदार रैपुरा के न्यायालय में द्रोपदी बाई की ओर से वाद दायर किया गया था। उक्त प्रकरण में आदेश करने के लिए 9 हजार रुपए रिश्वत की मांग की गई थी। आवेदक की आवेदन की जांच पुलिस अधीक्षक लोकायुक्त योगेश्वर शर्मा कराई गई, जो सत्य पाई गई। लोकायुक्त पुलिस सागर द्वारा आज सोमवार 9 जून को की गई ट्रैप कार्यवाही में आरोपी को उसके शासकीय आवास में 3 हजार रु. की रिश्वत लेते पकड़ा गया है, जानकारी मुताबिक अग्रिम विधिक कार्यवाही जारी है। ट्रैपकर्ता दल मे निरीक्षक श्रीमति रोशनी जैन, निरीक्षक अभिषेक वर्मा, निरीक्षक के पी एस बेन तथा लोकायुक्त स्टाफ शामिल रहा।<br></p>
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		<title>जब नदियां अपनी हत्या का बदला लेंगी, तो कोई नहीं बचेगा&#8230;</title>
		<link>https://soochanasansar.in/when-the-rivers-take-revenge-for-their-murders-no-one-will-be-spared/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Jun 2025 08:55:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Articles]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>@पीयूष बबेले, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ जी के मीडिया सलाहकार। WorldEnvironmentDay आज 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है। शब्दों के सागर प्रवाह मे दर्जनों लेख,खबरें, गतिविधियों के दरम्यान यह लेख पढ़ा जाना चाहिए। क्योंकि आज इसकी प्रासंगिकता अति आवश्यक है। सभ्यताएं मातृहंता होती हैं मशहूर पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र अक्सर यह बात सभ्यता और &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>@<strong>पीयूष बबेले, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ जी के मीडिया सलाहकार। </strong></p>



<h1 class="wp-block-heading">WorldEnvironmentDay</h1>



<p>आज 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है। शब्दों के सागर प्रवाह मे दर्जनों लेख,खबरें, गतिविधियों के दरम्यान यह लेख पढ़ा जाना चाहिए। क्योंकि आज इसकी प्रासंगिकता अति आवश्यक है। </p>



<p>सभ्यताएं मातृहंता होती हैं मशहूर पर्यावरणविद् <strong>अनुपम मिश्र </strong>अक्सर यह बात सभ्यता और नदी के रिश्ते के बारे में कहा करते थे। उनका कहना था कि सभ्यताएं जिन नदियों के किनारे पैदा होती हैं, विकसित होने के बाद उन्हीं नदियों को खा जाती है। यह बात दिल्ली वाले यमुना के बारे में, कानपुर वाले गंगा के बारे में और हजारों-हजार लोग अपने-अपने गांव-कस्बे में सूख चुकी नदियों को देखकर बखूबी समझ सकते है।</p>



<p>हममें से हर आदमी अपने-अपने हिस्से की सूखती नदी को देखकर वास्तव में दुखी होता है। सूखी नदी से गुजरते हुए अपने बचपन की यादों में जाता है। नदी मे छपाकों के बीच होने वाली शरारतें उसके मन में हूक उठाती है। फिर अचानक हम वापस वर्तमान में आते है और व्यवस्था को कोसते हुए कंधे झटककर आगे बढ़ जाते है। इस पूरी प्रक्रिया में या तो नादानी बस या फिर जानबूझकर हम इस बात को बिलकुल दरकिनार कर देते हैं कि नदी सुखाने में बहुत नहीं, तो थोड़ी भूमिका हमारी भी है।</p>



<p>व्यवस्थाओं की गलतियां तो हम अक्सर समझ ही लेते हैं, आज इस पर्यावरण दिवस पर हम अपने हिस्से की गलतियों को समझने की भी कोशिश करते है। सबसे पहले हम यह समझते हैं कि नदी किसे कहते है। आपको लगेगा कि यह बड़ी बचकानी बात है कि नदी किसे कहते हैं, लेकिन अगर एक बार हम नदी को ढंग से समझ लें तो हमें अपनी और अपनी व्यवस्था की गलितयां समझने में आसानी होगी।</p>



<p><strong>नदी किसे कहते है</strong>&#8211; </p>



<p>चलिए पहले गंगा की ही बात करते है। जो लोग उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा करके लौटते हैं, उनके मुंह से आपने अक्सर सुना होगा कि गंगोत्री से तो पतली सी धार निकलती है, लेकिन नीचे आकर गंगा बड़ी हो जाती है। और न जाने कैसे मैदान में आकर इतनी बड़ी नदी बन जाती है। उनका विस्मय सही है, क्योंकि नदी कोई पानी की धार भर नहीं है जो अपने उद्गम से निकलकर समुद्र में मिलने तक सीधी बहती चली जाती है।</p>



<p>गंगा को बनाने में गंगोत्री जैसे हजारों ग्लेशियर लगे होते हैं जो पूरे हिमालय से हजारों जल धाराएं और नदियां पैदा करते हैं, जो गंगा में मिलती रहती हैं और नदी बनती जाती है।</p>



<p>इन ग्लेशियरर्स के अलावा दूसरी चीज जो नदी को बनाती है वह है बारिश का पानी। गंगा नदी के बेसिन में जहां जितना पानी बरसता है, अंतत: उसे सहायक नदियों के जरिए गंगा की मुख्यधारा में मिलना है और नदी को बड़ा करना है।</p>



<p>इन दो चीजों के अलावा तीसरी चीज है भूजल। यानी जमीन के नीचे भरा पानी। आपने देखा होगा कि आपके शहर या गांव के पास बहने वाली नदी का तल गांव-शहर के सबसे निचले तल से भी नीचा होता है। अगर नदी का तल ऊंचा और गांव का तल नीचा हो, तो फिर तो गांव पानी में डूब ही जाएगा। यह व्यवस्था इसलिए है कि जब बारिश नहीं होती और ग्लेशियर भी कम पिघलते हैं, उस समय भी भूजल जमीन के भीतर बह रही एक्वाफिर्स या जलधाराओं के माध्यम से रिस-रिसकर नदी में जाता रहता है और नदी के प्रवाह को बनाए रखता है। यही वह प्रमुख वजह है जिनसे उन नदियों में भी सालभर पानी बना रहता है, जिनका जलस्रोत कोई ग्लेशियर नहीं है।</p>



<p>यानी नदी को बनाने के तीन प्रमुख कारक हैं- ग्लेशियर, वर्षा जल और भूजल। यह तीन चीजें आपको बताती हैं कि नदी बनती कैसे है. अब इन तीनों को जानने के बाद यह भी जान लिया जाए कि नदी मिटती कैसे है। और उसे मिटाने में हमारी भूमिका क्या है।</p>



<p><strong> नदी कैसे मरती है- </strong></p>



<p>गंगा के बारे में पहला एक्शन प्लान आए तीन दशक से ज्यादा का समय हो गया है। लेकिन नदी की दशा में अब तक कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। इसकी पहली वजह है कि आजादी के बाद अपनी बड़ी आबादी की भूख और प्यास मिटाने के लिए हमने बड़े पैमाने पर बांध बनाए और नहरें निकालीं। यही बांध शहरों को पानी सप्लाई के जरिए हमारी प्यास बुझाते हैं और खेतों को पानी देकर अन्न उपजाकर हमारी भूख मिटाते है। बुंदेलखंड जैसे जल संकट क्षेत्र मे नदियों पर बेतहासा खनन किया गया, जा रहा है। </p>



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<p><strong>घर पर पानी बर्बाद होता है तो नदी मरती है-</strong></p>



<p>इतनी बड़ी आबादी को जिंदा रखने के लिए ऐसा करना जरूरी भी था। लेकिन ऐसा करने के दौरान पानी की बरबादी करना बिलकुल जरूरी नहीं था। पहले आदमी जब नदी में नहाने जाता था, तो कितना भी नहा ले, वह नदी का एक बूंद पानी बरबाद नहीं कर पाता था, क्योंकि नदी का पानी नदी में रहता था। इसी तरह जब आदमी कुंए से पानी भरकर लाता था, तो घर में पानी का इस्तेमाल सिर्फ पीने के लिए और भोजन बनाने के लिए होता था। थोड़ा बहुत पानी निस्तार के लिए होता था। यह पानी इतना कम होता था कि घर से बाहर निकलने के बाद कच्ची जमीन में जाकर जमीन में सोख जाता था।</p>



<p>लेकिन जब बिना मेहनत के पानी घर आने लगा तो हम पानी का इस्तेमाल करने के बजाय उससे खेलने लगे। तकनीक के विकास, आधुनिक सुख सुविधाओं और औद्योगिक जरूरतें बढ़ने के बाद हमारा पानी का यह खेल खिलवाड़ में बदलता चला गया। नतीजा यह हुआ कि पहले बड़े शहर, फिर कस्बे और अब गांव तक नदी से पानी खींचे जा रहे हैं, बिना इसकी परवाह किए हुए कि यह पानी नदी को वापस मिल रहा है या नहीं।</p>



<p><strong>खेती के पैटर्न बदलते है तो नदी मरती है-</strong></p>



<p>यह तो हुई घरों और उद्योगों की बात, अब बात करते है खेती की। खेती को पानी चाहिए इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब खेती के नाम पर हमें बांधों और नहरों से पानी मिलने लगा तो हमें पानी की हवस हो गई। फिर हमने खेती के पैटर्न बदल दिए। पंजाब जैसा इलाका जिसे कुदरत ने चना और दलहन जैसी खेती के लिए बनाया था, उसे हमने खूब पानी पीने वाली धान और गेहूं जैसी फसलों का गढ़ बना दिया। गन्ना पहले बाढ़ वाले इलाकों में होता था, लेकिन जब गंगा की नहरें निकलीं तो पश्चिमी यूपी गन्ना बेल्ट बन गया। चूंकि ये दोनों इलाके हिमालय से निकलने वाली नदियों के रास्ते में पड़ने वाले पहले मैदानी इलाके थे, इसीलिए हमने यहीं पानी का खूब उपयोग कर डाला और उस उपयोग को जल बंटवारे के रूप में कानूनी जामा भी पहना दिया। जो पानी नीचे जाना चाहिए था, वह ऊपर ही जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होने लगा। इस बात की तस्दीक करनी है तो दिल्ली के ऊपर हरियाणा के हथिनी कुंड बैराज चले जाइये। इस बैराज के डाउन स्ट्रीम को आप पैदल चलकर पार कर सकते हैं और आपके पंजे तक नहीं भीगेंगे। क्यों, क्योंकि उसके ऊपर का सारा पानी कानूनी रूप से अलग-अलग राज्यों को बांट दिया गया है।</p>



<p><strong>जब गांव-शहर में बोरिंग होती है तो नदी मरती है-</strong></p>



<p>यहां तक हमने देखा कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हमने नदियों को बांधा और उनका पानी घरों, खेतों और फैक्ट्रियों तक ले आए। पानी मुठ्ठी में आने के बाद हमने अपनी जरूरतें बढ़ा ली और पानी से खिलवाड़ करने लगे लेकिन हमारी बढ़ती जरूरतों या फिर महात्मा गांधी के शब्दों में कहें तो बढ़ती हवस को पूरा करने के लिए यह पानी भी कम पड़ने लगा। तब हमने बहते पानी के साथ ही जमीन के भीतर बसे भूजल पर डाका डालना शुरू किया। घरों, खेतों और फैक्ट्रियों में पानी की तलब पूरी करने के लिए पूरे देश में अंधाधुंध बोरिंग की गईं। यह बोरिंग पुराने जमाने के कुओं और रहंट से भूजल निकालने के तरीकों से अलग थीं। कुएं से पानी निकालने में मेहनत लगती थी, इसलिए सीमित पानी निकाला जाता था। रहंट का पानी भी सीमित था। लेकिन बोरिंग के पाइप से निकलती मोटी धार जमीन को सुखाने के लिए बहुत काफी थी। पिछले साल नासा ने अपनी एक रिपोर्ट में दिखाया था कि पंजाब और हरियाणा के बड़े इलाके में भूजल बहुत ज्यादा गिर गया है, जबकि इस इलाके में औसत बारिश में कोई खास कमी नहीं आई है. यानी भूजल का बेतहाशा दोहन हो रहा है।</p>



<p>भूजल के इस दोहन के कारण जो पानी एक्वाफिर्स के जरिए वापस नदी में जाना चाहिए था, नदी में नहीं पहुंच सका. इस तरह नदियों को बांधने के बाद उन तक भूजल से होने वाली पानी की सप्लाई को भी हमने रोक दिया।</p>



<p><strong>जब सीवेज गिरता है तो नदी मरती है-</strong></p>



<p><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="300" class="wp-image-15639" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-scaled.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-scaled.jpg 2560w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-768x576.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-1536x1152.jpg 1536w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG20250114155640-2048x1536.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></p>



<p>नदी को मिलने वाले पानी के दो रास्ते बंद करके ही हमें संतोष नहीं हुआ। उसका साफ पानी छीनकर, हमने उसे जी भरकर गंदा किया। फिर प्रदूषित पानी सीवेज के रास्ते नदी में डाल दिया। दिल्ली में यमुना के किसी भी पुल से गुजरते समय दुर्गंध को जो भभका आपकी नाक को सड़ा देता है, असल में वह यमुना की लाश की बदबू है। यमुना की लाश इसलिए, क्योंकि हथनी कुंड में बंधने के बाद दिल्ली में यमुना में एक बूंद साफ पानी नहीं आता, जो पानी यमुना में दिखता है वह उसमें गिरने वाले 17 नालों का विशुद्ध प्रदूषित पानी है। वह सिर्फ गंदा नाला है, उसमें नदी के साफ पानी की एक बूंद नहीं है। इस तरह पहले हमने नदी को सुखाया और फिर उसमें प्रदूषित पानी डाल दिया. जब हमने नदी के साथ ऐसा क्रूर व्यवहार किया, तो नदी भी तो हमारे साथ कुछ करेगी।</p>



<p><strong>जब नदी मरती है, तो हम भी मरते है-</strong></p>



<p>नदी आखिर कब तक बर्दाश्त करती ? अब उसने बदला लेना शुरू कर दिया है। इस बदले को जरा वैज्ञानिक नजरिये से समझिये। हम यह जान चुके हैं कि प्राकृतिक रूप से भूजल रिसकर नदी में जाता है लेकिन जब हमने अंधाधुंध बोरिंग शुरू कर दी, तो भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया। इतना नीचे की नदी के तल से भी नीचे चला गया। ऐसे में हुआ यह कि पानी जमीन से रिसकर नदी में जाने के बजाय, नदी से रिसकर भूजल में मिलने लगा। चूंकि नदी में हमने पूरी तरह से प्रदूषित पानी डाला हुआ था, लिहाजा यही प्रदूषित पानी नदी में से रिसकर शहरों के पूरे भूजल को प्रदूषित करने लगा। इसका नतीजा हुआ कि अब हम जब गहरी बोरिंग करके पानी निकालते हैं तो हमें साफ पानी के बजाय प्रदूषित पानी मिलने लगा है। यह पानी बड़े पैमाने पर बीमारियों की जड़ बन रहा है।</p>



<p>दूसरी चीज यह कि जब भूजल को बेतहाशा निकाला जाता है तो जमीन के अंदर पानी और बाकी तत्वों का संतुलन गड़बड़ा जाता है। पश्चिम बंगाल की जाधवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर दीपांकर चक्रवर्ती ने इस असंतुलन पर पूरा अध्ययन किया है। अपने 20 साल से चल रहे शोध में वे अब तक बंगाल से लेकर पश्चिमी यूपी के गढ़मुक्तेश्वर तक गंगा के पास के भूजल में आर्सेनिक की ज्यादा मात्रा साबित कर चुके हैं। बढे़ हुए आर्सेनिक ने गंगा किनारे के सारे भूजल को पीने के लिए निषिद्ध कर दिया है। आपको यकीन नहीं होता तो यूपी के बलिया और आसपास के इलाकों में जाकर देखिए जहां आर्सेनिक ने कहर ढा रखा है। यहां आपको ऐसे हैंडपंप मिल जाएंगे, जिन पर लिखा रहता है कि इनका पानी न पिएं, इनमें आर्सेनिक ज्यादा है।</p>



<p>यही हाल यमुना का है। आगरा में यमुना का प्रदूषित जल शहर के भूजल में मिलने से पूरे शहर का भूजल प्रदूषित हो चुका है। गंगा-यमुना प्रमुख नदियां हैं, इसलिए इनकी जांच पड़ताल होती रहती है, लेकिन छोटी नदियों और उनके पास बसे कस्बों की विस्तृत जांच की जाएगी तो कहानी इससे उलट नहीं आएगी। इस भयावह सचाई के बाद मन में सवाल आएगा कि नदी का बदला रोकने के लिए कोई तो रास्ता होगा।</p>



<p><strong>हम भी बच सकते हैं और नदी भी, बशर्त&#8230;</strong></p>



<p>नदी का बदला रुक सकता है, लेकिन शांति का सफेद झंडा पहले हमें ही दिखाना होगा। अगर हम अपना मातृहंता स्वभाव छोड़ देंगे, तो माता भी कुमाता बनने को मजबूर नहीं होगी। इसके लिए पहली बात तो हमें अपने राष्ट्रपिता की ही माननी पड़ेगी जो उन्होंने एक शताब्दी पहले लिखी अपनी किताब हिंद स्वराज में कही थी। सवाल-जवाब शैली में लिखी इस पतली सी किताब में सवाल पूछा जाता है- क्या आप आजादी के बाद भारत का विकास इंग्लैंड के मॉडल पर करना चाहते है। जवाब आता है- नहीं, इंग्लैंड के मॉडल पर भारत का विकास नहीं हो सकता। इंग्लैंड छोटा सा देश है। और उसके इस तरह के विकास के लिए पूरी दुनिया का शोषण करना पड़ रहा है। अगर भारत जैसा देश इस मॉडल पर आगे बढ़ा तो उसे धरती जैसे कई ग्रहों का शोषण करना पड़ेगा।</p>



<p>महात्मा गांधी जो बात इतनी आसानी से कह गए, उस तक लौटने में हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी। पहली जरूरत तो यह होगी कि खेती की जरूरत के हिसाब से पानी के इस्तेमाल की बजाय पानी की उपलब्धता के हिसाब से खेती करनी होगी। यह काम हम हजारों साल से करते आए थे और इसे कुछ दशक पहले ही छोड़ा है। इस पर लौटा जा सकता है।</p>



<p>दूसरी चीज यह कि अब शहरों में रहना तो नहीं छोड़ा जा सकता और न उनकी पानी की जरूरत घटाई जा सकती है। ऐसे मे ग्राउंड वाटर रिचार्ज को आंदोलन के तौर पर छेड़ा जा सकता है। केरल जैसे राज्य इस बारे में रोल मॉडल हो सकते हैं। जहां ग्राउंड वाटर रिचार्ज शहरी जीवन का अभिन्न हिस्सा हो गया है। हम इस बात की ताकीद करें कि जहां से भी हम जमीन का पानी निकाल रहे हैं, हर हाल में उसका बड़ा हिस्सा जमीन को लौटा दे। ये रिचार्ज पिट बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने के भी काम आ जाएंगे। पहले यह काम तालाबों से होता था, लेकिन अब तालाबों की जमीन पर आबादी का अवैध और वैध दोनों तरह का कब्जा हो चुका है।</p>



<p>बाकी का काम सरकारों का है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और दूसरी बड़ी परियोजनाओं को सरकारें ही अपने मॉडल के हिसाब से चला पाएंगीं। लेकिन वे योजनाएं तभी बनेंगी, जब सरकारों को लगेगा कि जनता इनके लिए तैयार है। अगर जनता इसी तरह पानी खर्च करना चाहेगी तो सरकारें और ज्यादा पानी निकालने की योजनाएं बनाएंगी। और पानी की इस चाह में हम सूखा पैदा करते जाएंगे।</p>
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		<title>केन की सहायक नदी मध्यप्रदेश की &#8216;मिढ़ासन नदी&#8217; का भ्रष्टाचार…</title>
		<link>https://soochanasansar.in/corruption-of-madhya-pradeshs-midhasan-river-a-tributary-of-ken-river-bundelakhnd-regional/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 Apr 2025 05:23:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Stories]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[छतरपुर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>@अरुण सिंह पन्ना / आशीष सागर दीक्षित,बाँदा। मध्यप्रदेश सरकार ने इस नदी के पुनर्जीवन को 20 करोड़ रुपया खर्च किया लेकिन नतीजा ढांक के तीन पात। इस नदी की मुख्य सहायक नदी केन पन्ना, छतरपुर, बाँदा क्षेत्र मे भयावह उत्खनन का शिकार है। पन्ना / बाँदा। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले से प्रवाहित होने वाली केन &#8230;</p>
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<p><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="300" class="wp-image-15346" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1745124822863.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1745124822863.jpg 1080w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1745124822863-300x225.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1745124822863-1024x768.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/FB_IMG_1745124822863-768x576.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></p>



<p>@<strong>अरुण सिंह पन्ना / आशीष सागर दीक्षित,बाँदा।</strong></p>



<ul class="wp-block-list">
<li>मध्यप्रदेश सरकार ने इस नदी के पुनर्जीवन को 20 करोड़ रुपया खर्च किया लेकिन नतीजा ढांक के तीन पात।</li>



<li>इस नदी की मुख्य सहायक नदी केन पन्ना, छतरपुर, बाँदा क्षेत्र मे भयावह उत्खनन का शिकार है।</li>
</ul>



<p><strong>पन्ना / बाँदा</strong>। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले से प्रवाहित होने वाली केन नदी ( बाँदा की मुख्य नदी है जो चिल्ला फतेहपुर की सीमा पर यमुना से मिलती है ) की सहायक नदियों में शुमार <strong>&#8216;मिढ़ासन नदी</strong>&#8216; को पुनर्जीवित करने के नाम पर वर्षों पूर्व तक़रीबन 20 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके है। फिर भी इस नदी की हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ गई है। पहले तो इस नदी में गर्मी के समय कहीं-कहीं गड्ढों में पानी दिख भी जाता था, लेकिन अब तो यह पूरी तरह सूखे मैदान में तब्दील हो जाती है। पन्ना के वरिष्ठ बुजुर्ग पत्रकार श्री अरुण सिंह कहते है &#8216;मिढ़ासन नदी&#8217; को जीवित करना असल मे केन के जींवन प्रवाह और उसकी जैवविविधता को भी संरक्षण करना होगा। किंतु जब सरकारें केन-बेतवा लिंक जैसी वाहियात परियोजना से पन्ना का विशाल जंगल बर्बाद करने पर आमादा हो। वहीं दो नदियों के भौगोलिक तासीर को समझें बगैर यह नहर सिंचाई परियोजना सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश को ताक पर रखकर पूरी करने की ज़िद हो तब <strong>&#8216;मिढ़ासन नदी&#8217;</strong> के 20 करोड़ रुपया क्या मायने रखते है ? लिंक प्रोजेक्ट पर तो 40 हजार करोड़ दांव मे लगे है। केन नदी के प्रवाह / कैचमेंट क्षेत्रफल मे यूपी-एमपी तक चलती पोकलेन और लिफ्टर तो सरकार का आभूषण बन चुकी है।</p>



<p><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="226" class="wp-image-14985" style="width: 400px;" src="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG-20250308-WA0013-1.jpg" alt="" srcset="https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG-20250308-WA0013-1.jpg 1600w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG-20250308-WA0013-1-300x169.jpg 300w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG-20250308-WA0013-1-1024x577.jpg 1024w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG-20250308-WA0013-1-768x433.jpg 768w, https://soochanasansar.in/wp-content/uploads/IMG-20250308-WA0013-1-1536x866.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /><br>मालूम रहे कि मिढ़ासन नदी को सदानीरा बनाने का संकल्प तत्कालीन मुख्यमंत्री व मौजूदा केंद्र सरकार के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लिया था। साथ ही 15 वर्ष पूर्व बड़े ही धूमधाम के साथ इस अभिनव योजना का शुभारंभ किया गया था। किंतु नदियों को उत्खनन और जलराशियों को संरक्षण मे सरकारी ड्रामा बनाने की विशेषज्ञ ब्यूरोक्रेसी व भ्रष्ट तंत्र ने योजना की हवा निकाल दी है। वहीं पुनर्जीवन के नाम पर खर्च की गई राशि कहां और कैसे खर्च हुई, इस बात का आज तक खुलासा नहीं हो सका है। गौरतलब है कि यह मिढ़ासन नदी जस की तस रूखी-सूखी पड़ी है और सिर्फ बारिश होने पर ही यह नदी बहती नजर आती है। इस लिहाज से सदानीरा बनने के बजाय यह नदी बरसाती बनकर रह गई है। यह कुछ वैसे ही है जैसे उत्तरप्रदेश के भूभाग पर बहने वाली महोबा क्षेत्र की उर्मिल,धसान, चंद्रावल नदियां जिन्हें लाख जतन व भारी बजट के बावजूद उत्खनन की मार और सरकारी अदूरदर्शिता के चलते धरातल पर पुनर्जीवित नही किया जा सका। यह अलग बात है कि सूबे के यूपी जलशक्ति मंत्रियों / अफसरों ने इनके बजट खर्च पर मीडिया कैमरे मे तसले उठाकर जल सम्मान हासिल किए है। कहते है आत्ममुग्धता उस धृतराष्ट्र की तरह है जो संजय के युद्ध वर्णन करने के बावजूद आंखों व बौद्धिक मिजाज से सूरदास ही रहे। यहां यह भी बतलाते चले कि छतरपुर-पन्ना-बाँदा की जीवनरेखा केन नदी (कर्णवती ) बीते दो दशकों से खनन माफियाओं व सत्ता पोषित ठेकेदारों से भयावह स्वरूप मे बर्बादी की चपेट पर है।</p>
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		<title>केन बेतवा लिंक प्रभावित गांवों के किसानों ने निकाली न्याय पदयात्रा…</title>
		<link>https://soochanasansar.in/farmers-of-ken-betwa-link-affected-villages-took-out-a-march-for-justice-this-story-bundelakhnd-regional/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Apr 2025 05:22:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>@आशीष सागर दीक्षित, बाँदा। “हम प्रशासन के सुझावों को प्रभावित गांवों के किसानों के बीच में रखेंगे और अगली बैठक में फिर मजबूती से अपनी बात रखेंगे।” केन बेतबा लिंक प्रभावित किसानों और प्रशासन के बीच समाधान समिति की पहली बैठक सम्पन्न। किसानों के 13 ठोस बिंदु, कुछ मांगों पर सहमति तो कुछ पर असमंजस, &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://soochanasansar.in/farmers-of-ken-betwa-link-affected-villages-took-out-a-march-for-justice-this-story-bundelakhnd-regional/">केन बेतवा लिंक प्रभावित गांवों के किसानों ने निकाली न्याय पदयात्रा…</a> appeared first on <a href="https://soochanasansar.in">Soochana Sansar</a>.</p>
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<p>@<strong>आशीष सागर दीक्षित, बाँदा। </strong></p>



<p>“<strong>हम प्रशासन के सुझावों को प्रभावित गांवों के किसानों के बीच में रखेंगे और अगली बैठक में फिर मजबूती से अपनी बात रखेंगे।”</strong></p>



<ul class="wp-block-list">
<li>केन बेतबा लिंक प्रभावित किसानों और प्रशासन के बीच समाधान समिति की पहली बैठक सम्पन्न।</li>



<li>किसानों के 13 ठोस बिंदु, कुछ मांगों पर सहमति तो कुछ पर असमंजस, अगली बैठक तय लेकिन समाधान की उम्मीद कम।</li>
</ul>



<p><strong>सटई, छतरपुर</strong>। बुंदेलखंड क्षेत्र मे यूपी-एमपी के मध्य प्रस्तावित केन-बेतवा लिंक जब तक धरातल पर मुकम्मल न हो इस परियोजना का विवादों से नाता नही टूटेगा। इस क्रम मे बीते 15 अप्रैल को सटई के किसानों का जत्था छतरपुर कलेक्ट्रेट की तरफ सांकेतिक घेराव और न्याय पदयात्रा की शक्ल मे निकला था। किसानों ने बताया कि आंदोलन के दबाव मे प्रशासन ने तुरंत कार्यवाही करते हुए एसडीएम बिजावर श्री विनय द्विवेदी (भू-अर्जन अधिकारी, केन-बेतवा परियोजना) की अध्यक्षता में एक समाधान समिति का गठन किया। वहीं इसी समिति की प्रथम संयुक्त बैठक मांगलवार को ही उसी शाम सटई नगरपंचायत सभागार में शाम 7 बजे आयोजित हुई है। यह बैठक लगभग 90 मिनिट चली जिसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जय किसान संगठन के पदाधिकारी और प्रभावित ग्रामीण प्रतिनिधि उपस्थित रहे है।</p>



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<p><strong>वहीं आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने इस बैठक मे किसानों की तरफ से 13 ठोस बिंदु, पारदर्शिता और जनसुनवाई की मांग के लिए रखें है।</strong></p>



<p>न्याय पदयात्रा का नेतृत्व कर रहे किसानों की ओर से अमित भटनागर ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पारिस्थितिकीय प्रभाव को लेकर 13 बिंदुओं पर विस्तार से तथ्यात्मक बात रखी है। जय किसान संगठन से जुड़े अमित भटनागर ने बताया 2013 की मूल भावना के खिलाफ है। प्रशासन द्वारा प्रस्तुत ग्राम सभा के दस्तावेज फर्जी व मनगढ़ंत हैं।वहीं ग्राम सर्वेक्षण पारदर्शी नहीं हुआ है जिससे मुआवज़ा, आजीविका और भूमि हानि के मामलों में कई अनियमितताएं सामने आई है। किसानों के डूब क्षेत्र मे स्थित मकानों का मुआवजा बहुत कम दिया गया है, साथ ही भूमि संबंधी विसंगतियां भी है। परियोजना मे किसानों के मुआवजे गलत नामों पर दर्ज किए गए है। प्रभावितों की सूची सार्वजनिक नहीं की जा रही है और न ही किसी ग्राम सभा में उसे प्रस्तुत किया गया।</p>



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<p><strong>किसान नेता ने कहा कि प्रशासन ने मानी कुछ बातें, अगली बैठक की घोषणा-</strong></p>



<p>आंदोलन कर्ता ने कहा कि एसडीएम बिजावर श्री विनय द्विवेदी ने किसानों की मांगों पर बिंदुवार प्रतिक्रिया दी और कहा कि कुछ बिंदुओं पर प्रशासन और किसानों के बीच सहमति बन गई है। जबकि कुछ मुद्दों पर अगली बैठक में और विचार किया जाएगा। उन्होंने आश्वस्त किया कि कलेक्टर महोदय को किसानों का पत्र और 13 बिंदुओं की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जाएगी। प्रशासन की तरफ से सटई तहसीलदार मृगेंद्रबंद उपाध्याय, नायब तहसीलदार इंद्र कुमार गौतम भी उपस्थित रहे।</p>



<p><strong>पन्ना जिले से भी किसानों की भागीदारी, आंदोलन को मिला जिला-सीमा पार समर्थन- </strong></p>



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<p><br>इस समाधान बैठक और पदयात्रा की विशेष बात रही कि इसमें न केवल छतरपुर जिले के 19 गांवों के किसान शामिल हुए, बल्कि पन्ना जिले के 7 गांवों के किसान भी पूरी सक्रियता के साथ सहभागी बने। समाधान बैठक में किसानों की तरफ से अमित भटनागर, बहादुर आदिवासी, दिव्या अहिरवार, बब्लू यादव पूर्व सरपंच गहदरा, राजाराम आदिवासी पूर्व सरपंच कूड़न जिला पन्ना, महेश पूर्व जनपद सदस्य घमरी जिला पन्ना, नत्थू रैकवार उपसरपंच पलकौहा, बाबूलाल आदिवासी गह्दरा जिला पन्ना, रामकेश आदिवासी मरहा जिला पन्ना, पप्पू आदिवासी मझौली जिला पन्ना, महेश विश्वकर्मा, पवन पटेल, ब्रजलाल आदिवासी नेगुवां, हिसाबी राजपूत, बालकिशन आदिवासी, दयाराम आदिवासी सुरई, मोती आदिवासी बिनेका, साहब सिंह सुकवाहा, अच्छे लाल अहिरवार पलकौहा, कल्ला अहिरवार सुकवाहा, तिलक आदिवासी बिला सहित 50 लोग उपस्थित रहे है।</p>
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