
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए भाजपा ने आठ प्रत्याशियों के नाम घोषित कर दिए हैं। प्रत्याशियों में पार्टी ने पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दलित, ब्राह्मण, ठाकुर और महिला प्रतिनिधित्व का संतुलन रखने के साथ संगठन में सक्रिय चेहरों को संसद भेजने का फैसला किया है।
भाजपा ने धर्मपाल सिंह लोधी, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को प्रत्याशी बनाया है। इनमें कई चेहरे संगठन में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में राज्यसभा के जरिये पार्टी ने एक तरफ अनुभवी संगठनकर्ताओं को सम्मान दिया है तो दूसरी तरफ अलग-अलग सामाजिक समूहों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश की है।
गैर-यादव पिछड़े वर्ग को संदेश
धर्मपाल सिंह और प्रकाश पाल के जरिये भाजपा ने गैर-यादव पिछड़े वर्ग को संदेश दिया है। प्रकाश पाल पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। वहीं धर्मपाल सिंह लंबे समय से भाजपा संगठन और सरकार में मंत्री के रूप में सक्रिय भूमिका में हैं। सपा का पीडीए प्रयोग पिछड़े वर्गों को अपने साथ जोड़ने पर केंद्रित है। ऐसे में भाजपा के लिए गैर-यादव पिछड़े वर्गों का समर्थन बनाए रखना वर्ष 2027 की बड़ी चुनौती है
इसी तरह श्रुति गंगवार का नाम इसी सामाजिक रणनीति से जुड़ा दिखता है। झारखंड के राज्यपाल एवं पार्टी के वरिष्ठ नेता संतोष गंगवार की बेटी श्रुति को राज्यसभा भेजकर भाजपा ने महिला प्रतिनिधित्व, नई पीढ़ी और कुर्मी समाज को एक साथ संदेश देने की कोशिश है।बरेली-रुहेलखंड के क्षेत्रीय समीकरण के हिसाब से भी ये अहम है।
दलित समाज को साधने की कोशिश
भाजपा ने प्रियंका सिंह रावत और विद्यासागर सोनकर के रूप में दलित प्रतिनिधित्व को भी जगह दी है। प्रियंका रावत पासी समाज से आती हैं और बाराबंकी क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पहचान रही है। वहीं विद्यासागर सोनकर लंबे समय से भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। दोनों नामों के जरिये पार्टी का प्रयास दलित समाज में अपने आधार को व्यापक बनाने का है।
इनके साथ राधाकांत ओझा व गोपी कृष्ण पांडेय के जरिये ब्राह्मण समाज और राम प्रताप सिंह चौहान के नाम से ठाकुर समाज को भी प्रतिनिधित्व मिला है। राम प्रताप सिंह संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इस तरह सूची में किसी एक जातीय समूह को अत्यधिक महत्व देने के बजाय भाजपा ने अपने व्यापक सामाजिक गठबंधन का संतुलन कायम रखने की कोशिश की है।
राज्यसभा चुनाव में असली राजनीतिक परीक्षा आठवीं सीट को लेकर होगी। भाजपा सात सीटें आसानी से जीतने की स्थिति में है, जबकि आठवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी।



