जनतंत्र के महायज्ञ की मर्यादा बचाएं

विश्वनाथ सचदेवजनतंत्र में चुनाव युद्ध नहीं होता, जिसमें सब कुछ जायज़ मान लिया जाता है। जनतंत्र में चुनाव एक यज्ञ है जो तन-मन की पवित्रता के साथ किया जाता है। इन दो वाक्यों में ‘होता हैÓ और ‘जाता हैÓ शब्द शायद उचित नहीं है। कम से कम आज जिस तरह हमारे देश में चुनाव हो रहे हैं, उसे देखते हुए तो नहीं ही। इसलिए, कहा यह जाना चाहिए कि जनतंत्र में चुनाव एक महायज्ञ है, उसे युद्ध नहीं माना जाना चाहिए। यह महायज्ञ पूरी पवित्रता के साथ संपन्न किया जाना चाहिए।ऐसा नहीं है कि पहले चुनावों में सब कुछ उचित ही होता था। विकार तो 1952 के पहले चुनावों में ही दिखने लगे थे, पर आज चुनाव में जितनी विकृतियां दिखाई देने लगी हैं, उन्हें देखकर तो डर-सा लगता है। वैसे, चुनाव सही ढंग से सम्पन्न कराने के लिए हमने आदर्श आचार संहिता भी बना रखी है। उसके पालन का दिखावा भी होता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि राजनीति के हमारे खिलाड़ी येन-केन-प्रकारेण जीत में ही विश्वास करते हैं। वह सब कुछ उचित मान लिया गया है जो चुनाव जीतने में मददगार हो सकता है। जाति, धर्म, वर्ण, भाषा आदि सब राजनीति के हथियार बन गये हैं। धन-बल भी हमारी राजनीति में जायज़ मान लिया गया है और बाहु-बल भी। हमारी राजनीति में विरोधी को मतदाता की दृष्टि में नीचा गिराने के लिए कुछ भी किया जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए नेता और उनके समर्थक कुछ भी कर रहे हैं, कुछ भी कह रहे हैं।हाल ही में स्वयं प्रधानमंत्री ने बोफोर्स मुद्दे को उछालकर इस ‘कुछ भीÓ का एक उदाहरण ही पेश किया है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ चुनाव क्षेत्र में एक चुनावी-सभा में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सीधे संबोधित करते हुए कहा-आपके पिता को उनके रागदरबारियों ने ‘मिस्टर क्लीनÓ कहा था। पर उनके जीवन का अंत भ्रष्टाचारी नंबर एक के रूप में हुआ।राहुल के पिता राजीव गांधी वर्ष 1984 से 1989 तक देश के प्रधानमंत्री थे और 1991 में एक आतंकवादी हमले में उनकी मृत्यु हुई थी। और उन्हें ‘मिस्टर क्लीनÓ रागदरबारियों ने नहीं, देश के मीडिया ने कहा था। हां, यह सही है कि उन पर बोफोर्स कांड में लिप्त होने का आरोप लगा था, लेकिन सही यह भी है कि बोफोर्स कांड में आज तक आरोप प्रमाणित नहीं हो पाये हैं। आरोप प्रमाणित न हो पाने का अर्थ यह नहीं होता कि अपराध हुआ ही नहीं था, पर बिना प्रमाणों के किसी को अपराधी घोषित करना भी तो उचित नहीं है। फिर प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचारी नंबर एक वाली बात क्यों कही?सच तो यही है कि इन चुनावों में आरोपों-प्रत्यारोपों का जो घटिया स्तर दिखाई दे रहा है, और कुछ भी कहने की जो प्रवृत्ति उफान पर है, राजीव गांधी पर आरोप उसी का ताज़ा उदाहरण है- और यह दुर्भाग्य ही है कि देश के प्रधानमंत्री अप्रिय उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले एक साल से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जिस तरह से ‘प्रधानमंत्री चोर हैÓ के नारे लगवा रहे हैं, वह भी हमारी राजनीति के घटिया होते स्तर का ही उदाहरण है और इस पर प्रधानमंत्री का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है। लेकिन क्षोभ की अभिव्यक्ति का जो तरीका प्रधानमंत्री ने अपनाया है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। फिर उनका कांग्रेस को यह चुनौती देना कि वह बाकी बचे चुनाव राजीव गांधी के नाम पर लड़ ले, एक तरह से मुद्दा बदलने की कोशिश ही माना जायेगा। अंग्रेज़ी में इसे ‘गोल पोस्टÓ बदलना कहते हैं और यह कमज़ोर होने का प्रमाण माना जाता है। देश के लगभग दो-तिहाई मतदाता वोट दे चुके हैं। बाकी बचे भी शीघ्र ही अपनी राय वोट-मशीन में दर्ज करवा देंगे। ऐसे में राजीव गांधी के नाम पर चुनाव लडऩे की चुनौती देकर प्रधानमंत्री क्या हासिल करना चाहते हैं, यह बात समझ आनी मुश्किल है।बहरहाल, सवाल मुद्दे बदलने का ही नहीं है, सवाल चुनाव-प्रचार के स्तर का घटिया से घटिया होते जाने का है। चिंता की बात यह भी है कि स्तर के इस क्षरण में छुटभैये राजनेता तो लगे ही हैं, बड़े नेता भी घटिया राजनीति का लाभ उठाने के लोभ से बच नहीं पा रहे। हो सकता है कि इससे उनकी राजनीति कुछ लाभान्वित हो जाए, पर इस प्रवृत्ति से हमारे जनतंत्र को निश्चित रूप से नुकसान पहुंच रहा है। क्यों ज़रूरी है कि राजनेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालें? क्यों राजनेता को यह लगता है कि आरोपों की राजनीति से मतदाता को भरमाया जा सकता है? क्यों प्रधानमंत्री को यह लग रहा है कि कांग्रेस के एक दिवंगत नेता पर लगे आरोपों को फिर से उछाल कर वे वोटों की राजनीति में अपनी स्थिति को मज़बूत बना लेंगे?वर्ष 2014 में देश की जनता ने तब की कांग्रेस सरकार की गलतियों-कमियों के मद्देनजऱ भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता सौंपी थी। निश्चित रूप से मतदाता को यह उम्मीद थी कि नयी सरकार देश की समस्याओं को सुलझाने की ईमानदार कोशिश करेगी। पर पिछले पांच साल से हम लगातार यह देखते आ रहे हैं कि अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का हवाला देने के बजाय सरकार पिछली सरकारों के पचास साल के क्रियाकलापों की ही दुहाई देती रही। इन चुनावों में भी हमने यही सब देखा। अब ‘मिस्टर क्लीनÓ का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री ने फिर ऐसी ही एक कोशिश की है। चुनाव-प्रचार अपनी उपलब्धियों-संकल्पों के आधार पर होना चाहिए। विरोधी की कमियों-ग़लतियों को रेखांकित करना भी ग़लत नहीं है, पर यह काम मर्यादा में रह कर होना चाहिए। जनतंत्र में विरोधी दुश्मन नहीं होता। विरोध वैचारिक होता है, नीतियों का होता है। इस विरोध को गरिमाहीन बनाने का मतलब जनतंत्र को न समझना ही नहीं होता, जनतंत्र का अपमान करना भी होता है। दुर्भाग्य से हमारे बहुत से बड़े नेता भी जनतंत्र में विरोधी और दुश्मन के अंतर को नहीं समझना चाहते।चुनाव महापर्व है जनतंत्र का। इसे एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के अवसर के रूप में देखना अपनी कमज़ोरी को ही सिद्ध करना होता है। ‘भ्रष्टाचारी नंबर एकÓ वाले बयान में प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि राफेल के नाम पर राहुल गांधी ‘मोदी की पचास साल की तपस्या को धूल में नहीं मिला सकते।Ó कोई किसी तपस्या को निष्फल नहीं बना सकता। हां, यह ज़रूरी है कि तपस्या सच्ची हो, सच्चे मन से की गयी हो। प्रधानमंत्री जिस तपस्या की बात कर रहे हैं, उसका, उनकी राजनीति से क्या रिश्ता है, वही जानें। जनतंत्र में राजनीति का मैदान सतही बातों से युद्ध जीतने के लिए नहीं होता। अपनी बड़ी लकीर खींचकर प्रतिस्पर्धी की लकीर छोटी करनी पड़ती है इस यज्ञ में। इस यज्ञ में, जो जितना बड़ा है, उससे उतना ही विनम्र होने की अपेक्षा की जाती है-फलों से लदी टहनी की तरह। हमारे राजनेता इस बात को कब समझेंगे?00

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जनतंत्र के महायज्ञ की मर्यादा बचाएं

विश्वनाथ सचदेवजनतंत्र में चुनाव युद्ध नहीं होता, जिसमें सब कुछ जायज़ मान लिया जाता है। जनतंत्र में चुनाव एक यज्ञ है जो तन-मन की पवित्रता के साथ किया जाता है। इन दो वाक्यों में ‘होता हैÓ और ‘जाता हैÓ शब्द शायद उचित नहीं है। कम से कम आज जिस तरह हमारे देश में चुनाव हो रहे हैं, उसे देखते हुए तो नहीं ही। इसलिए, कहा यह जाना चाहिए कि जनतंत्र में चुनाव एक महायज्ञ है, उसे युद्ध नहीं माना जाना चाहिए। यह महायज्ञ पूरी पवित्रता के साथ संपन्न किया जाना चाहिए।ऐसा नहीं है कि पहले चुनावों में सब कुछ उचित ही होता था। विकार तो 1952 के पहले चुनावों में ही दिखने लगे थे, पर आज चुनाव में जितनी विकृतियां दिखाई देने लगी हैं, उन्हें देखकर तो डर-सा लगता है। वैसे, चुनाव सही ढंग से सम्पन्न कराने के लिए हमने आदर्श आचार संहिता भी बना रखी है। उसके पालन का दिखावा भी होता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि राजनीति के हमारे खिलाड़ी येन-केन-प्रकारेण जीत में ही विश्वास करते हैं। वह सब कुछ उचित मान लिया गया है जो चुनाव जीतने में मददगार हो सकता है। जाति, धर्म, वर्ण, भाषा आदि सब राजनीति के हथियार बन गये हैं। धन-बल भी हमारी राजनीति में जायज़ मान लिया गया है और बाहु-बल भी। हमारी राजनीति में विरोधी को मतदाता की दृष्टि में नीचा गिराने के लिए कुछ भी किया जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए नेता और उनके समर्थक कुछ भी कर रहे हैं, कुछ भी कह रहे हैं।हाल ही में स्वयं प्रधानमंत्री ने बोफोर्स मुद्दे को उछालकर इस ‘कुछ भीÓ का एक उदाहरण ही पेश किया है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ चुनाव क्षेत्र में एक चुनावी-सभा में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सीधे संबोधित करते हुए कहा-आपके पिता को उनके रागदरबारियों ने ‘मिस्टर क्लीनÓ कहा था। पर उनके जीवन का अंत भ्रष्टाचारी नंबर एक के रूप में हुआ।राहुल के पिता राजीव गांधी वर्ष 1984 से 1989 तक देश के प्रधानमंत्री थे और 1991 में एक आतंकवादी हमले में उनकी मृत्यु हुई थी। और उन्हें ‘मिस्टर क्लीनÓ रागदरबारियों ने नहीं, देश के मीडिया ने कहा था। हां, यह सही है कि उन पर बोफोर्स कांड में लिप्त होने का आरोप लगा था, लेकिन सही यह भी है कि बोफोर्स कांड में आज तक आरोप प्रमाणित नहीं हो पाये हैं। आरोप प्रमाणित न हो पाने का अर्थ यह नहीं होता कि अपराध हुआ ही नहीं था, पर बिना प्रमाणों के किसी को अपराधी घोषित करना भी तो उचित नहीं है। फिर प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचारी नंबर एक वाली बात क्यों कही?सच तो यही है कि इन चुनावों में आरोपों-प्रत्यारोपों का जो घटिया स्तर दिखाई दे रहा है, और कुछ भी कहने की जो प्रवृत्ति उफान पर है, राजीव गांधी पर आरोप उसी का ताज़ा उदाहरण है- और यह दुर्भाग्य ही है कि देश के प्रधानमंत्री अप्रिय उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले एक साल से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जिस तरह से ‘प्रधानमंत्री चोर हैÓ के नारे लगवा रहे हैं, वह भी हमारी राजनीति के घटिया होते स्तर का ही उदाहरण है और इस पर प्रधानमंत्री का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है। लेकिन क्षोभ की अभिव्यक्ति का जो तरीका प्रधानमंत्री ने अपनाया है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। फिर उनका कांग्रेस को यह चुनौती देना कि वह बाकी बचे चुनाव राजीव गांधी के नाम पर लड़ ले, एक तरह से मुद्दा बदलने की कोशिश ही माना जायेगा। अंग्रेज़ी में इसे ‘गोल पोस्टÓ बदलना कहते हैं और यह कमज़ोर होने का प्रमाण माना जाता है। देश के लगभग दो-तिहाई मतदाता वोट दे चुके हैं। बाकी बचे भी शीघ्र ही अपनी राय वोट-मशीन में दर्ज करवा देंगे। ऐसे में राजीव गांधी के नाम पर चुनाव लडऩे की चुनौती देकर प्रधानमंत्री क्या हासिल करना चाहते हैं, यह बात समझ आनी मुश्किल है।बहरहाल, सवाल मुद्दे बदलने का ही नहीं है, सवाल चुनाव-प्रचार के स्तर का घटिया से घटिया होते जाने का है। चिंता की बात यह भी है कि स्तर के इस क्षरण में छुटभैये राजनेता तो लगे ही हैं, बड़े नेता भी घटिया राजनीति का लाभ उठाने के लोभ से बच नहीं पा रहे। हो सकता है कि इससे उनकी राजनीति कुछ लाभान्वित हो जाए, पर इस प्रवृत्ति से हमारे जनतंत्र को निश्चित रूप से नुकसान पहुंच रहा है। क्यों ज़रूरी है कि राजनेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालें? क्यों राजनेता को यह लगता है कि आरोपों की राजनीति से मतदाता को भरमाया जा सकता है? क्यों प्रधानमंत्री को यह लग रहा है कि कांग्रेस के एक दिवंगत नेता पर लगे आरोपों को फिर से उछाल कर वे वोटों की राजनीति में अपनी स्थिति को मज़बूत बना लेंगे?वर्ष 2014 में देश की जनता ने तब की कांग्रेस सरकार की गलतियों-कमियों के मद्देनजऱ भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता सौंपी थी। निश्चित रूप से मतदाता को यह उम्मीद थी कि नयी सरकार देश की समस्याओं को सुलझाने की ईमानदार कोशिश करेगी। पर पिछले पांच साल से हम लगातार यह देखते आ रहे हैं कि अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का हवाला देने के बजाय सरकार पिछली सरकारों के पचास साल के क्रियाकलापों की ही दुहाई देती रही। इन चुनावों में भी हमने यही सब देखा। अब ‘मिस्टर क्लीनÓ का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री ने फिर ऐसी ही एक कोशिश की है। चुनाव-प्रचार अपनी उपलब्धियों-संकल्पों के आधार पर होना चाहिए। विरोधी की कमियों-ग़लतियों को रेखांकित करना भी ग़लत नहीं है, पर यह काम मर्यादा में रह कर होना चाहिए। जनतंत्र में विरोधी दुश्मन नहीं होता। विरोध वैचारिक होता है, नीतियों का होता है। इस विरोध को गरिमाहीन बनाने का मतलब जनतंत्र को न समझना ही नहीं होता, जनतंत्र का अपमान करना भी होता है। दुर्भाग्य से हमारे बहुत से बड़े नेता भी जनतंत्र में विरोधी और दुश्मन के अंतर को नहीं समझना चाहते।चुनाव महापर्व है जनतंत्र का। इसे एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के अवसर के रूप में देखना अपनी कमज़ोरी को ही सिद्ध करना होता है। ‘भ्रष्टाचारी नंबर एकÓ वाले बयान में प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि राफेल के नाम पर राहुल गांधी ‘मोदी की पचास साल की तपस्या को धूल में नहीं मिला सकते।Ó कोई किसी तपस्या को निष्फल नहीं बना सकता। हां, यह ज़रूरी है कि तपस्या सच्ची हो, सच्चे मन से की गयी हो। प्रधानमंत्री जिस तपस्या की बात कर रहे हैं, उसका, उनकी राजनीति से क्या रिश्ता है, वही जानें। जनतंत्र में राजनीति का मैदान सतही बातों से युद्ध जीतने के लिए नहीं होता। अपनी बड़ी लकीर खींचकर प्रतिस्पर्धी की लकीर छोटी करनी पड़ती है इस यज्ञ में। इस यज्ञ में, जो जितना बड़ा है, उससे उतना ही विनम्र होने की अपेक्षा की जाती है-फलों से लदी टहनी की तरह। हमारे राजनेता इस बात को कब समझेंगे?00

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