वैराग्य का गृहस्थ धर्म

एक किसान अपने परिवार से नाराज होकर अयोध्या के एक आश्रम में गया। उसने महंत से कहा, ‘मैं वैराग्य लेना चाहता हूं। आप मुझे दीक्षा दें।Ó महंत ने कहा, ‘दीक्षा तो मैं दे दूंगा लेकिन तुम उसे निभा नहीं पाओगे।Ó किसान ने कहा, ‘आप मेरी परीक्षा ले लें गुरुदेव।Ó महंत ने कहा, ‘ठीक है, कुछ दिन तुम इस आश्रम में रहो।Ó आश्रम में स्वादिष्ट पकवान बनते थे। किसान अच्छे-अच्छे पकवान खाकर खुश हो गया। एक दिन संत ने कहा, ‘वत्स आज से तुम बगल की झोपड़ी में रहोगे।Ó किसान झोपड़ी में रहने लगा। खाने के लिए उसे रोटी-दाल दी जाती थी। किसान को यह अच्छा नहीं लगा। वह महंत से बोला, ‘गुरुदेव झोपड़ी में बहुत कष्ट है। महंत ने कहा, ‘वत्स, वैरागी बनने की यह पहली सीढ़ी है। तुम अभी से परेशान होने लगे।Ó किसान ने सोचा कि इतना कष्ट तो उसे गांव में भी नहीं उठाना पड़ा था। महंत उसका द्वंद्व समझ गये। बोले, ‘वत्स, तुम जिसे वैराग्य समझते हो, वह वैराग्य नहीं है और जो वैराग्य है, उसे तुम कर नहीं सकते। वैरागी को अपने खाने-पीने, रहने-सोने की चिंता नहीं होती। उसे तो दूसरों के दुखों की चिंता होती है। सबसे बड़ा वैराग्य तो गृहस्थ धर्म है।प्रस्तुति : सुभाष बुड़ावनवाला

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