
नयी दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने गाजा में इजराइल की सैन्य कार्रवाई और उस पर भारत सरकार के रुख को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की “चुप्पी” न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के भी खिलाफ है। सोनिया गांधी के अनुसार, भारत का पारंपरिक कूटनीतिक संतुलन कमजोर हुआ है और देश अपने पुराने सहयोगियों से दूर होता जा रहा है। अपने लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि गाजा में हो रही घटनाओं पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया बेहद सीमित रही है। उन्होंने इसे “पत्थर जैसी चुप्पी” बताते हुए कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर गंभीर बहस और विरोध हो रहा है, तब भारत का रुख असामान्य रूप से निष्क्रिय दिखता है।

उन्होंने दावा किया कि यह स्थिति भारत की विदेश नीति के ऐतिहासिक मूल्यों के विपरीत है,
जो उपनिवेशवाद विरोध, शांति और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ एकजुटता पर आधारित रही है। सोनिया गांधी ने संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की जून 2026 की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें गंभीर निष्कर्ष सामने आए हैं। उनके अनुसार, रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि इजराइल गाजा में फिलिस्तीनी आबादी को खत्म करने के इरादे से कार्रवाई कर रहा है और इसमें बच्चों को भी निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इस आयोग की अगुवाई भारत के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस. मुरलीधर कर रहे हैं और 94 पन्नों की इस रिपोर्ट में कई गंभीर आरोप दर्ज हैं।सोनिया गांधी ने कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में फलस्तीन, ईरान और पश्चिम एशिया के अपने पारंपरिक साझेदारों से दूरी बनाई है। इसका असर भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि भारत पहले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संतुलित और स्वतंत्र आवाज के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब उसकी स्थिति बदलती हुई दिखाई दे रही है।
अपने लेख में उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देश अब गाजा संकट पर स्पष्ट रुख अपना रहे हैं।
फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने फिलिस्तन को मान्यता देने की दिशा में कदम उठाए हैं। साथ ही दक्षिण अफ्रीका द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में इजराइल के खिलाफ मामला दर्ज करने का भी उन्होंने उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कई लैटिन अमेरिकी देशों ने भी इजराइल के साथ कूटनीतिक संबंध सीमित किए हैं। सोनिया गांधी ने गाजा की एक पांच वर्षीय बच्ची हिंद रजब का उदाहरण देते हुए वहां की स्थिति को “मानवीय त्रासदी” बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को दुनिया के सामने लाना जरूरी है ताकि मानवीय संकट को समझा जा सके।
उन्होंने यह भी दावा किया कि इस विषय पर बनी एक फिल्म को भारत में लंबे समय तक अनुमति नहीं दी गई और बाद में सार्वजनिक दबाव के बाद ही इसे मंजूरी मिली।
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि अमेरिका के समर्थन के कारण इजराइल को अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने कथित युद्ध अपराधों का दस्तावेजीकरण किया है, लेकिन वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मतभेदों के कारण ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। सोनिया गांधी ने कहा कि भारत की विदेश नीति पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा नीति में संतुलन की कमी दिखाई देती है और भारत ऐसे समय में इजराइल के अधिक करीब दिख रहा है, जब कई देश उससे दूरी बना रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा का भी उल्लेख किया और कहा कि इस तरह के निर्णयों का दीर्घकालिक रणनीतिक प्रभाव हो सकता है। अपने लेख में सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि भारत की निष्क्रियता का लाभ पाकिस्तान ने उठाने की कोशिश की है और खुद को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने दावा किया कि भारत अपनी पारंपरिक भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने में पीछे रह गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोनिया गांधी के लेख को साझा करते हुए इसे विदेश नीति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी बताया। वहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि यह लेख भारत से मानवीय मूल्यों और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की अपील करता है।



