नए भारत की नींव है राष्ट्रीय शिक्षा नीति


डॉ. सुशील त्रिवेदी**
आधुनिक भारत में शिक्षा के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटना के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आई है । नए भारत की बुनियाद रचने वाली यह नीति भारत के जीवन आदर्शों पर आधारित है जो अत्यन्त साहसिक और पूर्णत: समावेशी है। यह नीति पूर्व प्राथमिक से लेकर उच्चतर स्तर तक की शिक्षा को पूरी तरह रूपान्तरित करने की क्षमता से परिपूर्ण है । इस नीति में प्रारंभिक बचपन में देखभाल और शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है, जिस पर इसके पूर्व में किसी शिक्षा नीति में ध्यान नहीं दिया गया था ।


वर्तमान में स्कूल पाठ्यक्रम के लिए प्रचलित 10+2 वाले ढ़ांचे की जगह नई शिक्षा नीति में 5+3+3+4 के ढांचे का प्रावधान किया गया है । 5+3+3+4 के नए ढांचे के पहले चरण में 3 से 8 वर्ष तक के बचपन की देखभाल और शिक्ष का प्रबंध होगा, दूसरे चरण में 8 से 11 वर्ष तक के बच्चों, तीसरे चरण में 11 से 14 वर्ष तक के बच्चों और फिर चौथे चरण में 14 से 18 वर्ष तक के किशोरों की शिक्षा की व्यवस्था होगी । यह ध्यान देने की बात है कि अब तक की शिक्षा व्यवस्था में 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं था । नई शिक्षा नीति में 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम के तहत लाकर बच्चे के मानसिक विकास को महत्वपूर्ण चरण के रूप में शीर्ष महत्व दिया गया है । इससे बच्चों का उनके 3 से 6 वर्ष तक की उम्र में अधिक समावेशी विकास होगा । इसके लिए उनके पोषण पर अधिक ध्यान दिया गया है और अब बच्चों को वर्तमान में दिए जाने वाले मिड-डे-मील के साथ ही सुबह के समय ऊर्जा से आपूरित ब्रेकफास्ट देने का भी प्रावधान किया गया है । इस तरह नई प्रणाली में 3 साल की आंगनबाड़ी/ प्रि-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी।
स्कूल के पाठ्यक्रम और अध्यापन का लक्ष्य यह होगा कि 21वीं सदी के प्रमुख कौशल या व्यावहारिक जानकारियों से विद्यार्थियों को लैस करके उनका समग्र विकास किया जाए और आवश्यक ज्ञान प्राप्ति तथा अपरिहार्य चिंतन को बढ़ाने और अनुभवात्मक शिक्षण पर अधिक ध्यान दिया जाए । इसके तहत फोकस करने के लिए सैद्धांतिक पाठ्यक्रम को कम किया जाए । इस लिहाज से विद्यार्थियों को पसंदीदा विषय चुनने के लिए कई विकल्प दिए जाएंगे । स्कूलों में छठी कक्षा से ही व्यावसायिक शिक्षा देनी शुरू कर दी जाएगी और इसमें इंटर्नशिप शामिल होगी। इससे बच्चों में कौशल का विकास होगा और उनकी क्षमता बढ़ेगी तथा पढ़ाई के दौरान विद्यार्थी कमाई करने में भी सक्षम होगा । बड़ी बात यह है कि केवल सैद्धांतिक शिक्षा दिए जाने के कारण विद्यार्थियों द्वारा अध-बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने की जो वर्तमान समस्या है उसका भी समाधान होगा । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है अब देश के सभी बच्चे स्कूलों में भर्ती होकर लगातार और उत्कृष्ट गुणात्मक शिक्षा प्राप्त करेंगे।
इस नीति में त्रिभाषा-फार्मूले को अपनाने पर जोर दिया गया है । इसके अंतर्गत कम से कम कक्षा 5 तक जरूरी तौर पर और यदि संभव हो तो कक्षा 8 और उससे आगे भी मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा को ही शिक्षा का माध्यम रखा जाएगा । इसके तहत विद्यार्थियों को स्कूल के सभी स्तरों और उच्च शिक्षा में संस्कृत को एक विकल्प के रूप में चुनने का अवसर दिया जाएगा । विद्यार्थी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जाएगी । भारत की अन्य पारंपरिक भाषाएं और साहित्य भी विकल्प के रूप में उपलब्ध होंगे । कुछ विदेशी भाषाओं को भी माध्यमिक शिक्षा स्तर पर एक विकल्प के रूप में चुना जा सकेगा । भारतीय संकेत भाषा यानी साइन लैंग्वेज (आईएसएल) को देश भर में मानकीकृत किया जाएगा और दिव्यांग विद्यार्थियों द्वारा उपयोग किए जाने के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पाठ्यक्रम सामग्री विकसित की जाएगी ।
अब कला और विज्ञान के बीच, पाठ्यक्रम और पाठ्येतर गतिविधियों के बीच और व्यावसायिक एवं शैक्षणिक विषयों के बीच कठोर रूप से कोई अंतर नहीं होगा। विद्यार्थियों को अपना विषय चुनने में काफी छूट दी जाएगी । विज्ञान, गणित और कला के विषयों का मिश्रण विद्यार्थियों में आजीवन सीखने की उत्कंठा बढ़ा देगा।
सभी विद्यार्थी कक्षा 3, 5 और 8 में स्कूली परीक्षाएं देंगे, जो उपयुक्त प्राधिकरण द्वारा संचालित की जाएंगी । कक्षा 10 और कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं को आसान बनाया जाएगा और बजाए बच्चों के रटने की क्षमता का परीक्षण करने के बजाए उनके विषय की बुनियादी समझ को जांचा जाएगा । विद्यार्थी को एक बार फिर से परीक्षा देने की अनुमति होगी और इस तरह दो बार दी गई परीक्षा में उसे जो भी बेहतर अंक प्राप्त होंगे उनके आधार पर उसका परीक्षा परिणाम घोषित किया जाएगा ।
शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से वंचित समूहों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा और कोई भी बालक या बालिका अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंधी विशिष्ट पहचान एवं दिव्यांगता के कारण शिक्षा पाने से छूट नहीं पाएगा । दिव्यांग बच्चों को बुनियादी चरण से लेकर उच्च शिक्षा तक की नियमित शिक्षा प्रक्रिया में पूरी तरह से भाग लेने में सक्षम बनाया जाएगा।
एक आकलन के अनुसार अभी प्रायमरी शालाओं में पढऩे वाले बच्चों में से कोई 5 करोड़ ऐसे हैं जो अपनी उम्र और कक्षा के अनुरूप लिखने ओर पढऩे तथा मामूली जोड़-घटाना करने के गणित में भी निपुण नहीं हैं । नई शिक्षा नीति के अनुसार 2025 तक आंगनबाड़ी के 3 वर्ष और पहली तथा दूसरी कक्षा में 2 वर्ष की पढ़ाई के बाद, 8 वर्ष के उम्र में कक्षा-3 तक पहुंचने वाले सभी बच्चे बुनियादी लिखने-पढऩे और गणित करने में प्रवीण होंगे । राष्ट्रीय शिक्षा नीति का यह दृढ़ मत है कि बुनियादी शिक्षा की आवश्यकताओं को पूरा कर लेने पर शिक्षा के शेष चरणों को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकेगा।
(लेखक/स्तम्भकार एवं पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, रायपुर हैं, ये लेखक के अपने विचार हैं)

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