यह कैसा समझौता नैशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालि

यह कैसा समझौता
नैशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (इसाक-मुइवा) के महासचिव थुइंगलेंग मुइवा ने यह कहकर सबको चौंका दिया है कि नगा झंडा और अलग संविधान को छोडऩे का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि यह नगा संप्रभुता का हिस्सा है।

उनका कहना है कि इस बात को 2015 के उस फ्रेमवर्क समझौते में भी स्वीकार किया गया था, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हस्ताक्षर हुए थे। उनके मुताबिक उस समझौते में ‘दो पहचानों के अपनी संप्रभु शक्ति साझा करते हुए समावेशी, शांतिपूर्ण, सह-अस्तित्वÓ की बात कही गई थी और इस आधार पर यह सहमति बनी थी कि ‘नगा भारत के साथ रहेंगे, पर उसमें विलीन नहीं होंगे।Ó
यह बात ऐसे समय कही गई है जब दिल्ली में इसी हफ्ते उस फ्रेमवर्क समझौते के आधार पर ही अंतिम समझौते के लिए अगले दौर की बातचीत होनी है। दिलचस्प बात यह कि जिस फ्रेमवर्क समझौते के आधार पर इतना कुछ कहा-सुना जा रहा है, उसे आज तक देश के सामने रखा ही नहीं गया है। 1997 से चली आ रही 18 वर्षों की बातचीत के बाद जब 3 अगस्त 2015 को इस पर हस्ताक्षर हुए तो प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए कहा था कि यह एक समस्या की समाप्ति का ही नहीं बल्कि एक नए भविष्य की शुरुआत का मौका है।
बावजूद इसके, समझौते को सार्वजनिक नहीं किया जा सका। नतीजा यह कि आज पांच साल बाद भी देशवासी इससे पूरी तरह अनजान हैं कि इसमें दोनों पक्षों ने किन-किन बातों पर किस रूप में सहमति जताई है। पांच साल बाद अब समझौते से जुड़ा एक पक्ष अगर यह कह रहा है कि उसे अलग संप्रभु शक्ति के रूप में मान्यता दी गई है तो इसके दूसरे पक्ष के रूप में केंद्र सरकार को ही आगे आकर स्पष्ट करना होगा कि कही जा रही बात सही है या नहीं, और क्या इसके आधार पर नगा पक्ष अलग झंडा, अलग संविधान की मांग कर सकता है।
भारतीय संप्रभुता का जो स्वरूप हम बीती आधी सदी से से देखते आए हैं, उसमें भारत के भीतर मौजूद किसी भी राजनीतिक इकाई के लिए भारतीय संविधान से इतर कोई और संविधान अपनाना संभव नहीं है। तिरंगे से अलग झंडे भी राजनीतिक दलों के हुआ करते हैं, राज्यों के नहीं। लेकिन थुइंगलेंग मुइवा ने यह विवादित बयान 14 अगस्त को कथित नगा आजादी के मौके पर नीले रंग का नगा झंडा फहराने के बाद दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय बाद जनसंघ के स्थापना काल से ही ‘दो विधान दो निशानÓ का विरोध उसकी पहचान हुआ करता था, जो फिर बीजेपी की भी पहचान बना।
इस भावना के तहत ही पिछले साल जम्मू-कश्मीर से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया। इसे देखते हुए लगता तो नहीं कि मोदी सरकार ने नगा पक्ष के साथ ऐसा कोई समझौता किया होगा। फिर भी पूरी बात स्याह-सफेद में देश के सामने रख दी जाए तो अच्छा रहेगा। सरकार का रुख शुरू से स्पष्ट रहा तो इस हफ्ते होने वाली बातचीत भी अधिक यथार्थपरक रहेगी।

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