कैसे खर्च चलाएं राज्यकोरोना महामारी और लॉकडाउन


कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दोहरे झटके के साथ ही केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी मुआवजे की रकम न दिए जाने से राज्य सरकारों की माली हालत बहुत बिगड़ गई है। गैर बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें अपनी परेशानी साफ तौर पर बता रही हैं। बीजेपी शासित सरकारें कुछ बोल नहीं पा रही हैं लेकिन सच यही है कि संकट सभी राज्य सरकारों के सामने है। अपने कर्मचारियों को वेतन देना भी उनके लिए मुश्किल हो रहा है। रोजमर्रा के खर्च के लिए संसाधन जुटाना एक समस्या बनता जा रहा है। वह भी ऐसे समय में, जब लगभग सभी राज्यों में कोरोना का संकट गहराता जा रहा है।


बिहार और असम के लिए बाढ़ एक अतिरिक्त समस्या है। स्वाभाविक रूप से राज्यों की सारी उम्मीदें केंद्र से मिलने वाले जीएसटी के अपने हिस्से पर टिकी हैं, मगर केंद्र की अपनी समस्याएं भी कम नहीं हैं। खासकर लद्दाख सीमा पर बने तनाव से फौजी खर्चे बहुत बढ़ गए हैं। सैनिकों की तैनाती, हथियारों की खरीद और ईंधन से लेकर रणनीतिक महत्व की दूसरी तमाम चीजों के भंडारण पर आने वाले खर्चे किसी भी रूप में टाले नहीं जा सकते। ऐसे में केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने रास्ता यह निकाला कि कोरोना वायरस के प्रकोप को एक्ट ऑफ गॉड बताते हुए जीएसटी मुआवजा राशि का भुगतान करने में असमर्थता जता दी जाए। वैसे भी यहां सवाल किसी छोटी-मोटी राशि का नहीं, 2 लाख 35 हजार करोड़ रुपये का है।
केंद्र का सुझाव है कि राज्य सरकारें फिलहाल रिजर्व बैंक से उधार लेकर अपना काम चलाएं, मगर राज्य इसके लिए तैयार नहीं हैं। वे कह रहे हैं कि उधार ही लेना है तो केंद्र सरकार ले और वादे के मुताबिक उनके नुकसान की भरपाई करने का अपना संवैधानिक दायित्व पूरा करे। यूं भी टैक्स सिस्टम में बदलाव के बाद राज्यों के पास अपने स्तर पर संसाधन जुटाने का कोई खास जरिया नहीं बचा है। जीएसटी सिस्टम के तहत राजस्व सीधे केंद्र के पास पहुंचता है, जो राज्यों को उनके हिस्से का भुगतान करने और जीएसटी लागू होने के पहले पांच वर्षों में 14 फीसदी सालाना बढ़ोतरी के साथ उनके नुकसान की भरपाई करने को वचनबद्ध है। कोरोना ने समस्या को अत्यधिक गंभीर रूप भले दे दिया हो, पर तथ्य यही है कि जीडीपी वृद्धि दर में लगातार आ रही कमी इसकी भरपाई की समस्या को पहले से ही बढ़ाती आ रही थी।
यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि मसला सिर्फ रकम तक सीमित नहीं है। इसका दूसरा पहलू केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग प्राथमिकताएं भी हैं, जिनमें किसी को भी कम महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता। जाहिर है, उधार लेकर विवाद को तात्कालिक रूप से हल कर लेने से भी समस्या हल नहीं होने वाली। देश के संघात्मक ढांचे के अनुरूप राज्य सरकारों के स्वतंत्र अस्तित्व और उनके दायित्वों का ध्यान रखते हुए वित्तीय संसाधनों के बंटवारे से जुड़ी इस नई परेशानी का स्थायी इलाज खोजा जाना चाहिए।

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